पश्चिम वनमंडल में पदस्थ एक रेंजर और एक ऑपरेटर का कारनामा

Chautha Sthambh

वन विभाग के रेंजर का कारनामा पशु किसी का, मुआवजा किसी को !

छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ )/मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय में स्थित वन मंडल कार्यालय विगत एक माह से सुर्खियों में बना है। जिलें में पहले पश्चिम वनमण्डल में एक वनरक्षक द्वारा शासकीय राशि गबनकांड तो पूर्व डिविजन में मोबिलिटी टेंडर प्रकिया में गड़बड़ी का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि अब एक रेंजर की भूमिका फिर कटघरे में खड़ी हो गई है। सूत्रों की मानें तो इस बार विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों की आंख में धूल झोंक कर एक रेंजर ने पशु मुआवजा प्रकरण की राशि एक ऑपरेटर के परिजनों के खाते में ट्रांसफर करवाकर राशि का हेरफेर को अंजाम दे दिया है।

दरअसल जंगलों के आसपास रहने वाले किसान अपने घरों में पालतू मवेशी पालते है। जिसमें मुख्य रूप से गाय, भैंस, बेल, बकरी सहित अन्य मवेशी शामिल होते है। जब कोई भी वन्यप्राणी इन पालतू मवेशियों का शिकार करता है तो वन विभाग का अमला पंचनामा कार्यवाही के बाद किसानों को

मुआवजा प्रकरण तैयार करता है। और कुछ दिनों बाद राशि स्वीकृत होने के बाद किसानों को सौंप दी जाती है या उसके खाते में डाल दी जाती है। यह राशि 5 हजार से लेकर 30 हजार रु तक होती है। जिस तरह के पशु होते है उसके हिसाब से मुआवजा राशि देने का नियम होता है लेकिन सूत्रों की मानें तो एक रेंजर जो बीते कई सालों से जिले की एक रेंज में पदस्थ है उसके द्वारा अपने ही कार्यालय में पदस्थ एक कंप्यूटर ऑपरेटर के साथ सांठगांठ कर पशु प्रकरण की राशि उसके परिजनों और रिश्तेदारों के खाते में डाल दी गई है।

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  • सूत्रों का दावा है कि ऐसे एक दो प्रकरण नहीं जबकि चार दर्जन से अधिक प्रकरण में शासकीय राशि का बंदरबांट किया गया है। जिसके बाद रेंजर और एक ऑपरेटर की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे है। लेकिन अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस राशि के हेरफेर की भनक विभागीय उच्च

    अधिकारियों को नहीं थी या फिर उनके संज्ञान में था तो उन्होंने इन शातिरों के ऊपर अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं की। जिसके बाद पूरे वनमण्डल के जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजिमी है।

    लगातार वन डिवीजनों में राशि के हेर फेर के मामले सामने आने के बाद कई वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका कटघरे में खड़ी होती है। इतना सब हो जाने के बाद भी अधिकारियों की खामौशी कही न कही कई सवाल को जन्म देती है।

    5 से तीस हजार रुपए तक स्वीकृत होता है मुआवजा

    विभागीय जानकारों की माने तो यदि कोई वन प्राणी पालतू मवेशियों का शिकार कर लेता है। तो वन विभाग अमला पंचनामा कार्रवाई के बाद पशु मालिक के नाम पशु मुआवजा प्रकरण तैयार करता है जिसके बाद कुछ दिनों उपरांत पशु मालिक को मुआवजा राशि दी जाती है। यहां उसके खाते में डाल दी जाती है। ये राशि पालतू मवेशी के ऊपर निर्भर होती है कि आखिर पशु कौन सा है। जिसमें गाय बैल, भैस, बकरी, सहित अन्य पशु शामिल होते है ये राशि पांच हजार से तीस हजार रुपए तक की होती है।

    घटना के 48 घंटे के भीतर देना होता है सूचना

    विभागीय जानकारों क माने तो वन विभाग द्वारा पशुओ के मामले में घायल होने या मरने पर आर्थिक सहायता दी जाती है। जिसके लिए घटना के 48 घंटों के भीतर वन विभाग को सूचित करना होता है या आवेदन के साथ फोटो पहचान पत्र या वन भूमि संबंधी दस्तावेज जैसे साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है। मप्र में दुधारू पशु के लिए लगभग तीस हजार रुपए एवं अन्य पशुओं के लिए अलग अलग राशि होती है साथ ही घायल पशु के लिए पचास प्रतिशत तक का मुआवजा देने का प्रावधान होता है। रेंज अधिकारी द्वारा जांच के बाद अधिकारी आदेश पारित करते है और राशि तय की जाती है।

    ऑपरेटर की भूमिका पर सवाल

    जिला मुख्यालय में स्थित एक वन कार्यालय में पशु मुआवजा प्रकरण राशि का हेर फेर किया गया है। सूत्रों की माने तो एक रेंजर ने एक ऑपरेटर की मदद से पशु मुआवजा प्रकरण राशि का हेरफेर किया है जिसमे कार्यालय में पदस्थ एक ऑपरेटर की भूमिका भी कटघरे में खड़ी होती है। सूत्रों द्वारा बताया जाता है कि अधिकारी द्वारा अपने ही कम्प्यूटर ऑपरेटर के परिजनों और संबंधित लोगों के खातों में राशि ट्रांसफर की गई है। यदि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में गंभीर होकर जांच करें तो ये राशि लाखों रुपए की हो सकती है। बता दे कि ये रेंजर कई वर्षों से जिले में पदस्थ है।

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