तुगलकी फरमान से घिरा जनजाति विभाग — क्या छात्रावासों की सच्चाई छिपाने की कोशिश?
छिंदवाड़ा(चौथा स्तंभ ) जनजातीय कार्य विभाग द्वारा छात्रावास और आश्रमों में मीडिया के प्रवेश पर अनुमति अनिवार्य करने का आदेश अब “तुगलकी फरमान” के रूप में चर्चा में आ गया है। पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि छिंदवाड़ा जिलें के छात्रावासों में लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद अब विभाग पारदर्शिता खत्म करने की कोशिश कर रहा है ताकि छात्रावासों और आश्रमों की वास्तविक स्थिति मीडिया तक न पहुंच सके।

सूत्रों की जानकारी के अनुसार विभाग द्वारा छात्रावास के अधीक्षकों को व्हाट्सएप के माध्यम से निर्देश दिए गए हैं कि बिना अनुमति कोई भी मीडिया प्रतिनिधि छात्रावास या स्कूल परिसर में प्रवेश नहीं कर सकेगा। इस आदेश को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसी पाबंदी की जरूरत क्यों पड़ी, जबकि पिछले वर्षों में छात्रावासों की कई समस्याएं मीडिया के माध्यम से ही सामने आई थीं।आरोप है कि छिंदवाड़ा के कई छात्रावासों में भोजन व्यवस्था, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रबंधन को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में मीडिया की खबरों के बाद ही अधिकारियों को कार्रवाई करनी पड़ी। ऐसे में अब मीडिया की एंट्री को अनुमति से जोड़ना संदेह पैदा कर रहा है।
विभाग का तर्क है कि बच्चों की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने के लिए अनुमति जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर सच्चाई छिपाने की कोशिश की जा रही है?
पत्रकारों का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक है तो मीडिया से डर क्यों?
छात्रावास और आश्रम सरकारी संस्थान हैं और जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं, इसलिए वहां की व्यवस्था पर जनता और मीडिया की निगरानी होना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल —
क्या जनजाति विभाग बच्चों की सुरक्षा चाहता है या छात्रावासों की हकीकत छिपाना चाहता है?
पत्रकारों और सामाजिक संगठन ने द्वारा उठी मांग…
पत्रकारों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि मीडिया पर अनावश्यक रोक लगाने के बजाय स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए ताकि बच्चों की सुरक्षा भी बनी रहे और छात्रावासों की सच्चाई भी सामने आती रहे।
