“शिक्षा से मोह भंग, छात्रावास से लगाव…! 10–15 साल से स्कूल नहीं पहुंचे कई शिक्षक, अधीक्षक बनकर जमें बैठे”
छिंदवाड़ा(चौथा स्तंभ )
जिले में जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावासों में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां कई शिक्षक और शिक्षिकाएं पिछले 10 से 15 वर्षों से स्कूलों में पढ़ाने की बजाय छात्रावास अधीक्षक का कार्य कर रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूलों की पढ़ाई व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार जिले मुख्यालय और आसपास के कई छात्रावासों में ऐसे शिक्षक पदस्थ हैं जो वर्षों पहले अस्थायी व्यवस्था के तहत छात्रावास अधीक्षक बनाए गए थे, लेकिन आज तक उन्हें उनके मूल पद यानी स्कूल में पढ़ाने के लिए वापस नहीं भेजा गया। नतीजा यह है कि जहां स्कूलों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है, वहीं कई शिक्षक छात्रावासों में आराम से अधीक्षक की भूमिका निभा रहे हैं। जिलें के सहायक आयुक्त की कई शिक्षक/शिक्षिकाओं पर इतनी मेहरबानी है कि जिला मुख्यालय में पत्नी बरसों से छात्रावास में अधीक्षिका है और उनके पति भी जिला मुख्यालय के पास के छात्रावास पर पदस्थ है और मजे की बात यह है कि अब उनके रिश्तेदारों शिक्षक को भी छात्रावास में अधीक्षक के पद पर पदस्थ किया गया है।
सूत्रों का कहना है कि जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त की मेहरबानी से यह पूरा खेल वर्षों से चल रहा है। नियमों के मुताबिक शिक्षक का मूल कार्य स्कूल में बच्चों को पढ़ाना है, लेकिन कई मामलों में शिक्षक 10–15 साल से स्कूल की चौखट तक नहीं पहुंचे।
स्थानीय लोगों और शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस व्यवस्था का सीधा नुकसान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले आदिवासी और गरीब बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। जहां बच्चों को योग्य शिक्षक मिलने चाहिए, वहां शिक्षक छात्रावासों में अधीक्षक बनकर बैठे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या इतने वर्षों से विभाग को यह स्थिति दिखाई नहीं दी?
क्यों नहीं की गई इन शिक्षकों की स्कूलों में वापसी?
क्या यह सब अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा है?
अब क्षेत्र के लोगों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग उठाई है। लोगों का कहना है कि अगर जांच ईमानदारी से हो जाए तो कई बड़े नाम और वर्षों से चल रहा खेल उजागर हो सकता है।
जनता की मांग:
वर्षों से छात्रावासों में जमे शिक्षकों को तत्काल स्कूलों में भेजा जाए।
पूरे जिले के छात्रावासों की जांच कराई जाए।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग इस गंभीर मामले पर क्या कार्रवाई करता है, या फिर यह “अधीक्षक व्यवस्था” यूं ही चलती रहेगी।
शिक्षा से मोह भंग, छात्रावास से लगाव…! 10–15 साल से स्कूल नहीं पहुंचे कई शिक्षक, अधीक्षक बनकर जमें बैठे”
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