10 वर्ष से छात्रावासों में चल रही मनमानी, कमीशन के दम पर दिया जाता है अधीक्षकों का प्रभार…

Chautha Sthambh

10 वर्ष से छात्रावासों में चल रही मनमानी, कमीशन के दम पर दिया जाता है अधीक्षकों का प्रभार…

कमीशन के चलते आदिवासी बच्चे हो रहे शोषण का शिकार, बदहाल व्यवस्था के बीच रहने को मजबूर बच्चे….

शिकायत पर नहीं होती कार्रवाई….

छिंदवाड़ा (चौथा स्तं) जिलें में जनजाति कार्य विभाग द्वारा संचालित अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रावासों /आश्रम शालाओं में कमीशन के आधार पर अधीक्षकों को प्रभार दिए जाने का खेल चल रहा है। इस खेल में शासन के नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन कमीशन के खेल के कारण कोई जांच कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश का नहीं हो रहा पालन…

जिलें में इन दिनों जनजाति कार्य विभाग में पदस्थ अधिकारी शासन के नियम को देखा रहे ढेंगा देखा रहे है, जबकि
छात्रावासों में अधीक्षकों के प्रभार के संबंध में शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी अधीक्षक को तीन वर्ष से अधिक किसी भी छात्रावास का अधीक्षक का प्रभार न दिया जाए और जैसे ही किसी अधीक्षक का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होता है, उसे विद्यालय में पढ़ाने के लिए वापस किया जाए। और पुन: कम से कम तीन वर्ष के बाद ही किसी छात्रावास के अधीक्षक पद का प्रभार सौंपा जाए। लेकिन जिले में कमीशन के खेल के कारण इस नियम का जमकर माखौल उड़ाया जा रहा है,

जिलें में संचालित छात्रावास में 10से 15 वर्षों से अधीक्षक के पद पर कुंडली मारकर बैठे…

जिलें में कुछ छात्रावास अधीक्षक ऐसे हैं जो पिछले 10 से 15 वर्षों से अधीक्षक के पद पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं, और सहायक आयुक्त जनजाति कार्य विभाग के द्वारा ऐसे अधीक्षकों को हटाने के संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

शासन के क्या है नियम

आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग मध्यप्रदेश शासन के पत्र क्रमांक/छात्रावास/164/2017/23255 के माध्यम से प्रदेश के छात्रावास अधीक्षकों की पूर्णकालिक संविदा अधीक्षकों की व्यवस्था के संबंध में दिशा निर्देश जारी किए गए थे। 3 वर्ष की पदस्थापना के उपरांत अधीक्षकों/संविदा अधीक्षकोंं/संविदा शाला शिक्षकों को स्कूलों में वापस पदस्थ किया जाए और उसके बाद कम से कम तीन साल उपरांत ही पुन: छात्रावास/आश्रमों में पदस्थ किया जाए…

जिलें के छात्रावास में 70फीसदी से ज्यादा अन्य वर्ग अधीक्षक…

जिलें में जनजाति विभाग द्वारा संचालित छात्रावास /आश्रम शाला में इन दिनों 70 फीसदी से ज्यादा अधीक्षक अन्य वर्ग के पदस्थ है
जनजातीय विभाग के अंतर्गत जिले में कुल करीब 195 छात्रावास संचालित हैं, वहीं जिला मुख्यालय में करीब 25 छात्रावास/आश्रम शाला संचालित हैं। विभागीय सूत्रों की बात माने तो जिले में करीब सत्तर फीसदी छात्रावासों में अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग से परे हटकर अन्य वर्ग के अधीक्षक पदस्थ किए गए हैं। अकेले जिला मुख्यालय की बात करें तो 25 छात्रावासों मेंं से करीब 15 छात्रावासों यानि पचास फीसदी से अधिक छात्रावासों में सामान्य, पिछडा वर्ग के अधीक्षक पदस्थ किए गए हैं।

नियम 3 वर्ष को, जमें है 15 वर्ष से अधिक समय से…?

छात्रावासों में अधीक्षकों के प्रभार के संबंध में शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी अधीक्षक को तीन वर्ष से अधिक किसी भी छात्रावास का अधीक्षक का प्रभार न दिया जाए। जैसे ही किसी अधीक्षक का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होता है, उसे विद्यालय में पढ़ाने के लिए वापस किया जाए। और पुन: कम से कम तीन वर्ष के बाद ही किसी छात्रावास के अधीक्षक पद का प्रभार सौंपा जाए। लेकिन जिला मुख्यालय में संचालित छात्रावास /आश्रम शालाओं में लगातार करीब 15 वर्ष से छात्रावास के अधीक्षक का प्रभारी बनाया गया है, ये अलग बात है कि बीच-बीच में उन्हे एक से दूसरे छात्रावास का प्रभार बदल दिया जाता है, विभागीय सूत्र बतातें हैं कि यह सब कमीशन के दम पर चल रहा है। कई अधीक्षक लगातार जिला मुख्यालय के छात्रावासों में ही अधीक्षक के पद पर अंगद के पांव की तरह जमे हुए हैं।

चौरई के STएंव SC छात्रावास में नहीं रहते अधीक्षक…चल रहा भगवान भरोसे काम

जनजातीय विभाग द्वारा संचालित चौरई मुख्यालय में संचालित STएंव SCबालक छात्रावास इन दिनों भगवान भरोसे संचालित हो रहा है, यंहा रात्रि में दोनों छात्रावास के अधीक्षक नहीं रहते है और कोई जिला मुख्यालय में रहकर चौरई का छात्रावास का संचालन कर रहे है तो कोई बाहर से आकर इन छात्रावासों को संचालन कर रहे हैं जब इस विषय में क्षेत्र सहयोग से बात हुई तो उनका कहना है कि हम जियोटेक से फोटो मांगते हैं लेकिन सिर्फ दिखावा के लिए एक दिन की फोटो खींचकर अधीक्षक ने जिला कार्यालय को पहुंचा दी गई बाकी फिर उनका काम वैसे ही चल रहा है अब देखना है कि जिला में बैठे सहायक आयुक्त ऐसे अधीक्षक पर क्या कार्रवाई करते हैं,क्या क्षेत्र संयोजक,मंडल संयोजक कभी इन छात्रावासों में रात्रि में निरीक्षण करने के लिए जाते है जबकि इनकी नियुक्त ही इन छात्रावासों के निरीक्षण के लिए हुई है, लेकिन देखा गया है कि अधिकाश समय तो क्षेत्र संयोजक एंव मंडल संयोजक सहायक आयुक्त कार्यालय में देखे जा सकते हैं, तो फिर जिलें में संचालित छात्रावासों का निरीक्षक आखिर कैसे होगा,इसलिए कहना गलत नही होगा कि इन दिनों छात्रावासों का निरीक्षण भगवान भरोसे सब चल रहा है..इसलिए अधीक्षक की लापरवाही चरम पर है

नियम विरूद्ध कर दिया गया स्थानांतरण…

छात्रावासों में अधीक्षक पद पर नियुक्ति एवं स्थानांतरण के मामले में लंबा खेल आदिवासी विकास विभाग में चल रहा है। सूत्रों की बात माने तो यहां सुविधा शुल्क के आगे नियमों की बलि चढ़ाई जा रही है, इसका एक और उदाहरण सामने यह है कि संविदा अधीक्षकों का स्थानांतरण एक छात्रावास से दूसरे छात्रावास में नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद आदिवासी बालक छात्रावास झिलमिली के अधीक्षक सुनील सोनी को जिला मुख्यालय के संयुक्य बालक छात्रावास पदस्थ कर दिया गया।यदि उनका संविदा अधीक्षक के पद से सविलियन कर दिया गया है तो उन्हें स्कूल में पढाने के लिए क्यों नहीं पदस्थ किया जा रहा है..

सहायक आयुक्त कार्यालय में बरसों से अटैच में पदस्थ है शिक्षक..

जिलें के जनजातीय कार्य विभाग छिंदवाड़ा में इन दिनों दस सालों से अधिक समय से शिक्षकों को बाबू का काम करा रहे है, उन्हें स्कूल में वापस नहीं किया जा रहा है, जिसका उदाहरण है संविदा अधीक्षक में पदस्थ हुए श्री रामकृष्ण बघेल को लगभग 16 सालों से सहायक आयुक्त कार्यालय छिंदवाड़ा में अटैचमेंट में पदस्थ है और बाबू का काम कर रहा है..?

सहायक आयुक्त कार्यालय में चपरासी बने बाबू…


सहायक आयुक्त कार्यालय छिंदवाड़ा में देखा गया है कि ग्रामीण क्षेत्र से आए चपरासी भी अब बाबू गिरी का काम कर रहे हैं,देखना होगा की जिलें में पदस्थ सहायक आयुक्त इन्हें कब अपनी मूल शाला में वापस करते हैं…

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