बरसात जब धरती को राहत देती है तब हमारे सरकारी स्कूल में बच्चों की जिंदगी को सजा बना देते है…
रिपोर्ट -ठा. रामकुमार राजपूत
(चौथा स्तंभ ) मध्य प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों की खस्ताहाल हालत एवं छत से टपकता पानी देखकर हमारी सरकार के मंत्री एंव नेता कब सुंध…
जी हाँ हम बात कर रहे है छिंदवाड़ा जिलें के आदिवासी अंचल तामिया के सरकारी प्राथमिक स्कुल आमाढाना की जंहा छत से टपकता पानी रोकने के लिए स्कूल में (प्लास्टिक) पॉलिथीन का सहारा लेना पड़ रहा है… जबकि..हमारे नेताजी आपने सरकारी दफ्तरो में एसी की ठंडी हवा में योजनाओं की फाइल में पलटते हैं जबकि उन्ही योजना की हकीकत बच्चों के सर पर छत से टपकते पानी से पूरी योजना की फाइल धुल जीती है…

स्कूल की छत से पानी टपकनी इंजीनियरिंग की नकमी नहीं जबकि सिस्टम की संवेदनहीनता का प्रतीक है…
जिस देश में शिक्षा का अधिकारी कानून बना है बहा शिक्षा के मंदिरों की छतें इतनी कमजोर है कि हर बारिश में शर्मसार कर देती हैं, बच्चों की किताबों की जगह बाल्टी और तस्लें पकड़ा दिए जाते हैं ताकि क्लास रुम को सुख रखा जा सके,छतो से पानी नहीं टपकता सरकार की नियत टपकता है..
किसी मंत्री के बंगले से यदि छत टपक जाए तो अगले ही दिन पूरा पीडब्ल्यूडी विभाग लगा जाता है लेकिन स्कूलों की छतो से सालों साल पानी गिरता रहता है और जबाब में मिलता है प्रस्ताव भेज दिया गया है बजट मिलते ही मरमट हो जाएगी ये हल तब है जब शिक्षा विभाग का बजट साल दर साल बढ़ता जा रहा है लेकिन खर्च कहां होता है दीवारों पर रंगरेगन नेताओं की दीवार पर फोटो और उद्घाटन के नाम पर लाखों रुपए खर्च कर दिया जाता है लेकिन छत की मरम्मत के नाम पर सालों दर सालों फाइल धूल खाते रहती हैं
बारिश की पहली बूंद जैसी ही जमीन पर गिरती है सरकारी स्कूलों की छत जवाब देना चालू कर देती हैं

कहीं पानी रिश्ता है कहीं प्लास्टर झड़ता है और कही छत ही गिर जाती है इन भवनों में पढ़ने वाले बच्चे किताबों की जगह छत से गिरने वाली बूंद को गिनते हैं वहीं दूसरी और सरकारी कार्यालय में बैठकों के लिए नया फर्नीचर आ जाता है. जनप्रतिनिधियों के केबिन में हर छ:महिने इंटीरियल बदल दिया जाता हैऔर सरकारी खजाने से लाखों का बजट कार्यालय सौंदरीकरण के नाम पर बहा दिया जाता है क्या यही सब का साथ सब का विकास है, सरकारी स्कूलों की हालत देखकर कोई नहीं कहेगा की 21वीं सादी के भारत में हम खड़े हैं टूटी छते, दीवारों से गिरता प्लास्टर और दुर्गंध भरे शौचालय यही हकीकत है सरकारी स्कूलों की जहां भारत का भविष्य तैयार किया जा रहा है
सरकारी आंकड़ों की माने तो हर साल सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए करोड रुपए का बजट स्वीकृति किया जाता है लेकिन जमीनी हकीकत यह है की हर साल स्कुलों की छत से पानी टपकता रहता है जब अफसर और नेताओं के बंगले में एक बल्ब भी खराब हो जाए तो उसके लिए टेंडर निकाले जाते हैं लेकिन स्कूलों की टपकती छत के लिए कोई इमरजेंसी टेंडर क्यों नहीं निकाला जाता क्योंकि यहां कोई वीआईपी के बच्चे नहीं पढ़ते आज जिस देश में हर महीने नई योजनाएं बनती हैं वह स्कूल भवनों की मरम्मत को क्यों प्राथमिकता नहीं दी जाती जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री 2047 की विकसित भारत की बात करते हैं लेकिन क्या विकसित भारत की नींव इतनी खोखली होती है जंहा बच्चे कक्षा में बैठने से डरते है नेताओं और अधिकारियों के पास टैबलेट है लेकिन बच्चों को बैठने के लिए बेंच तक नहीं मंत्रीगढ़ डिजिटल इंडिया की बात करते हैं लेकिन कई स्कूलों में बच्चों की कक्षाओं में बिजली तक नहीं, हर साल कई जिले से यही खबर आती है कि सरकारी स्कूल की छत गिरी बच्चे धायल हुए फिर प्रशासन जगाता है जांच बैठी है अधिकारी दौरे पर जाते हैं और दो दिन में सब शांत हो जाता है फिर वही स्कूल वही टूटी छत यह बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं तो और क्या सरकार से सिर्फ यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या आप भी आपने बच्चों को भेंज सकते है यदि नहीं तो फिर क्यों गरीब मजदूरों, किसान और दलीत के बच्चे इस सिस्टम की मार झेल रहे हैं यह सिर्फ भौतिक असामान्यता नहीं ये संवैधानिक अन्याय है शिक्षा का अधिकार सिर्फ किताबें बांटने से पूरा नहीं होता है…