जिला मुख्यालय के उत्कृष्ट बालक छात्रावास में शराब कांड, सिस्टम पर उठाए सवाल..?
छात्रावास में नशा, प्रशासन सख्त: वीडियो सामने आते ही अधीक्षक निलंबित
By admin -4 फरवरी 2026
चौथा स्तंभ (छिंदवाड़ा) जनजाति कार्य विभाग द्वारा संचालित जिला मुख्यालय स्थित उत्कृष्ट बालक छात्रावास में पढ़ने वाले बच्चों द्वारा शराब का नशा किए जाने का वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया। वीडियो सहायक आयुक्त जनजाति कार्य विभाग तक पहुंचते ही तत्काल कार्रवाई की गई।
मामले को गंभीर लापरवाही मानते हुए सहायक आयुक्त जनजाति विभाग ने छात्रावास के अधीक्षक को निलंबित कर दिया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि छात्रावास में रह रहे छात्रों की सुरक्षा, अनुशासन और देखरेख की जिम्मेदारी अधीक्षक की होती है, लेकिन इस मामले में घोर लापरवाही सामने आई है।
प्रशासनिक आदेश के अनुसार, छात्रावास में इस तरह की गतिविधियां यह दर्शाती हैं कि न तो प्रभावी निगरानी थी और न ही अनुशासन का पालन कराया जा रहा था। निलंबन अवधि में अधीक्षक को मुख्यालय से संबद्ध किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, वीडियो की जांच के साथ-साथ यह भी देखा जा रहा है कि शराब छात्रावास परिसर तक कैसे पहुंची, और इसमें किसी बाहरी व्यक्ति या स्टाफ की भूमिका तो नहीं रही। पूरे मामले की विभागीय जांच के संकेत भी दिए गए हैं।
यह घटना आदिवासी बच्चों की सुरक्षा और भविष्य से जुड़े संस्थानों में व्यवस्थाओं की पोल खोलती है, वहीं प्रशासन की त्वरित कार्रवाई ने यह संदेश दिया है कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


निलंबन से नहीं धुलेंगे दाग…
अधीक्षक को निलंबित कर देना विभाग की पहली और आसान कार्रवाई जरूर हो सकती है, लेकिन इससे यह सच नहीं बदलता कि यह छात्रावास सीधे तौर पर जनजाति कार्य विभाग और शासन के संरक्षण में संचालित होता है।ऐसे में यह सवाल लाज़िमी है कि—
निरीक्षण कब हुआ था?
आख़िरी बार छात्रावास की औचक जांच कब की गई?बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?
बच्चों की सुरक्षा या कागजी खानापूर्ति?
जनजाति वर्ग के बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षा और अनुशासन देने के उद्देश्य से बनाए गए छात्रावासों में यदि नाबालिग बच्चे शराब तक पहुंच बना रहे हैं, तो यह केवल एक घटना नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है।
यह घटना साफ संकेत देती है कि छात्रावासों की निगरानी सिर्फ फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित रह गई है, ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
अब सवाल सिर्फ अधीक्षक के निलंबन पर नहीं रुकना चाहिए…
क्या सहायक आयुक्त और जिला स्तर के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
क्या जनजाति कार्य विभाग के कार्यवाहक अधिकारी इस गंभीर चूक पर जवाब देंगे?
या फिर हमेशा की तरह एक कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा?
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि शासन की योजनाएं कागजों में भले उत्कृष्ट हों, लेकिन ज़मीनी अमल में भारी खामियां हैं।
अगर समय रहते सख्त और निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह मामला आने वाले समय में और भी बड़े सवाल खड़े करेगा।

