पातालकोट में राष्ट्रीय स्तर का ट्रेकिंग अभियान सफल
नदियों, पहाड़ों और जंगलों के बीच चार दिन बिताकर ट्रेकर्स ने जाना जनजातीय जीवन और संस्कृति
छिंदवाड़ा(चौथा स्तंभ) मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड, जिला प्रशासन छिंदवाड़ा एवं इंडिया हाईक्स के संयुक्त सहयोग से जिले के पातालकोट क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर का चार दिवसीय ट्रेकिंग कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस अभियान में देश के विभिन्न महानगरों से आए 15 ट्रेकर्स ने भाग लिया और प्रकृति की गोद में रहकर रोमांचक व ज्ञानवर्धक अनुभव प्राप्त किया।

करीब 25 किलोमीटर लंबे ट्रेक के दौरान ट्रेकर्स ने पातालकोट की गहराई में बहने वाली दूधी नदी के किनारे, घने जंगलों, ऊँचे-नीचे पहाड़ों और पथरीले रास्तों के बीच चार दिन बिताए। इस दौरान उन्होंने न केवल प्राकृतिक सौंदर्य को करीब से देखा, बल्कि पातालकोट की जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाजों और पारंपरिक जीवनशैली को भी समझा।

इस ट्रेकिंग कार्यक्रम से क्षेत्र के स्थानीय युवाओं और जनजातीय समुदाय को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। चिमटीपुर स्थित होमस्टे में परार्थ समिति द्वारा ट्रेकर्स का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया, जहाँ उन्होंने गेड़ी एवं सताम नृत्य का आनंद लिया।

कलेक्टर ने ट्रेकर्स से संवाद किया
ट्रेकिंग के पहले दिन जिला कलेक्टर श्री हरेंद्र नारायण, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री अग्रिम कुमार तथा परासिया एसडीएम श्री शुभम यादव ने चिमटीपुर बेस कैंप पहुंचकर नागपुर, बैंगलूरू, हैदराबाद, जयपुर, पांडिचेरी, गोवा, मुंबई, अहमदाबाद सहित अन्य स्थानों से आए ट्रेकर्स से मुलाकात की। अधिकारियों ने ट्रेकर्स से उनके अनुभव साझा किए और पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में सुझाव भी लिए।

प्रकृति के करीब लाया ट्रेकिंग अनुभव
ट्रेकर्स ने बताया कि पातालकोट के हरे-भरे जंगल, कोहरे से ढकी पहाड़ियों की चोटियाँ और शांत वादियाँ आत्मिक शांति प्रदान करती हैं। इस पर्वतीय क्षेत्र में ट्रेकिंग करने से उन्हें स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक जीवन को नजदीक से समझने का अवसर मिला, जो जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाला अनुभव रहा।

प्रकृति संरक्षण का लिया संकल्प
इस ट्रेकिंग कार्यक्रम को प्लास्टिक फ्री रखने की पहल की गई, जिसे सभी ट्रेकर्स ने सराहा। प्लास्टिक कचरा न फैलाने, पेड़ों को नुकसान न पहुँचाने और जैव विविधता के संरक्षण का सभी ने संकल्प लिया। ट्रेकिंग के दौरान पर्यावरण को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचे, इसका विशेष ध्यान रखा गया।

