परंपरा के नाम पर खूनी खेल…
छिदवाडा(चौथा स्तंभ )
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध गोटमार मेले में एक दुसरे पर को पत्थर मारने का बहशी खेल आज सुबह 10बजे से पांढुर्ना जिला मुख्यालय में शुरू हुआ भारी पुलिस बल ओर धारा 144 पुरी शहर लगने के बाद भी पुलिसकर्मी के बीच ये खेल चलता है इस मेले मैं हजारों लोगों का खून बहेता है….
यह मेला सदियों पुराना बताया जाता है..
इस मेले में पांढुर्णा शहर के लोग और सावरगांव के लोग जाम नदी पर पलाश का पेड़ बांध कर उसकी पूजा अर्चना कर एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं.
इस गोटमार मेले में कई लोग घायल होते हैं और क्यों की जान भी चली गई है..
फिर भी यह खूनी खेल बंद नहीं हो पाया है..
प्रशासन ने कई बार इस खूनी खेल को रोकने का प्रयास भी किया लेकिन यहां के लोग परंपरा का हवाला देकर इस खेल को बंद नहीं करना चाहते..

पांढुर्ना कलेक्टर ने बताया…
जिला कलेक्टर अजय देव शर्मा ने जानकारी देते हुए बताये की..घायलों के उपचार के लिए अलग-अलग सामुदायिक कैंप बनाए गए हैं..
सिवनी,छिंदवाड़ा और बैतूल से चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराया गया है पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस एवं डॉक्टर की व्यवस्थाएं की गई है…

वही पांढुर्ना पुलिस अधीक्षक ने बताया…
सुंदर सिंह कनेश ने जानकारी देते हुए बताया कि मेला क्षेत्र में सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई है.तीन एसएएफ की कंपनी, तीन एडिशनल एसपी, 10 डीएसपी समेत लगभग 600 पुलिसकर्मी तैनात है…

इस खूनी खेल में 1000 से ज्यादा लोग घायल, दो नागपुर रिफर..
एक क्रांति सुभाष चंद्र बोस ने चालू की थी तो दूसरे खून की क्रांति पांढुर्ना में गोटमार के नाम से…
एक रक्त कांति तब हुई थी जब नेता जी सुभाष चंद बोस ने देश की आजादी के लिये गठित की गई आजाद हिंद फौज के लिये नारा दिया था कि तुम मूझे खून दो में तुम्हें आजादी दूगां! दुसरी रक्त कांति गोटमार मेले की है जिसमें प्रति बर्ष सैकड़ों लोगों का खून बेवजह बहाया जाता है ओर प्रशासन खिलाडियों के जुनून के सामने मूक दशकों की तरह तमाशा देखता है आज भी प्रति बर्ष की तरह आयोजन शुरू हुआ पलास का पेड़ रूपी झंडा जामनदी मैं रोपा गया औऱ साबरगांव व पांढुर्णा के खिलाडियों के बीच गोटमार यानी एक दुसरे पर पत्थर चलाने का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर दोनों पक्षों की वहशत और जुनून बढता गया दोपहर 4 बजे तक 350 लोग धायल हुये और शाम तक ये आकंडा 1000 पहुंच गया दो लोगों को नागपुर रेफर किया गया..
तक पहुंच सकता है,इनमें से कई पत्थर मारने वाले खिलाड़ी को गभीर हलात मे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पांढुरना भेजे गये, ढोल नगाड़े बजते रहे मां चंडी के जयकारो के साथ दोनों पक्ष एक दुसरे बैखोफ होकर पथराव करते रहे ।

इस खूनी परंपरा का नियम….
इस खूनी परंपरा का नियम यह है कि सबारगांव वाले झंडा बधाते है तथा पाढुर्णा वाले तोड़ने के लिये एक दुसरे पर पत्थर की बारिश करते है इस पंरापरा की शुरू राजा भोसले की एक समय सैन्य छावनी रहे पाढुर्णा के सबारगांव मे पिडारी सैनिक रहते थे बहा यादव समुदाय के लोग भी रहते थे जिन्हें हर समय पिडारी सैनिक परेशान करते थे उन्हें दिनों सबारगांव की लडकी एंव पाढुर्णा का लडका मैं प्रेम हो गया एक दोनो भगाकर ले जा रहे युवक पर पत्थर से हमला किया गया दोनों जाम नदी मे कूद गये और बचाने का प्रयास कर रहे थे ले किन पीछा कर लोग समीप आ गये दोनों पर हुई बेइंतहा पत्थर की बारिश के कारण मौत हो गई दोनों शवों को माता चंडी के मंदिर लाया गया किवदंती हैं कि दोनों देवी की कृपा से जीवित हो गये तब से उनकी याद मैं यह गोटमार शुरू हुआ जो अब भी बददस्तूर जारी है
स्पेशल रिपोर्ट ठा. रामकुमार राजपूत
मोबाइल -8989115284