पुत्र की लंबी उम्र के लिए माँ के किया व्रतहर्षोल्लास के साथ मनाया हलछट

Chautha Sthambh

पुत्र की लंबी उम्र के लिए माँ के किया व्रत
हर्षोल्लास के साथ मनाया हलछट

छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ) हलछट पावन पर्व पर महिलाओ ने अपनी संतान की लंबी आयु के लिए उपवास किया, हरछठ का त्योहार जन्माष्टमी से दो दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन हल छठ माता, शीतला माता और भगवान बलराम की पूजा की जाती है। इस पर्व को ललही छठ, रांधण छठ, बजराम जयन्ती, कमर छठ और हल छठ इत्यादि कई नामों से मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रहती हैं और घर में किसी साफ-सुथरी जगह पर छठ माता की आकृति बनाकर उनकी विधि विधान पूजा करती हैं। इस पूजा में दही, चावल और महुआ का प्रयोग जरूर किया जाता है। महिलाओ ने हरछठ की कथा कहा कथानुसार एक राजा थे जिन्होंने जल के लिए सागर खुदवाया, घाट बनवाये, परन्तु उसमें पानी ही नहीं आया।

इससे राजा चिंतित हो गये और सोचने लगे कि अब क्या किया जाए। राजा ने गांव के पुरोहित को बुलाकर उपाय पूछा। पंडित ने कहा राजा उपाय तो बड़ा कठिन है लेकिन अगर ये उपाय किया जाता है तो उससे पानी अवश्य आ जाएगा। राजा ने कहा आप उपाय बताएं हम अवश्य करेंगे। तब पंडित ने राजा से कहा कि अगर तुम अपने बड़े लड़के या लड़की की बलि दे दो तो जल सागर में अवश्य भर जाएगा। ये सुनकर राजा और चिंतित हो गये। यह देखकर पंडित ने कहा हे राजन यदि तुम अपनी बहू को यह कहकर मायके भेज दो कि तुम्हारी मां की हालत बहुत खराब है जाओ उन्हें देख आओ तब ये उपाय किया जा सकता है। राजा ने ऐसा ही किया। ये सुनकर बहू बहुत दुखी हुई और सोचने लकी कि आज हरछठ के दिन यह कौन परेशानी आ गई। वह रोती-पीटती अपनी मां को देखने दौड़ गई। जब वह मायके पहुंची, उनकी मां ने उसे इस तरह व्याकुल देखा तो वो चौंक गईं और कहने लगी, ‘अरे हमरे का भा हम तौ ठीक हन। आजु हलछठ का दिन, ख्यातन की मेंड लरिकन की महतारी का ना नांघै का चही, न ख्यात मंझावै का चही। तुम भला रोवती पीटत ख्यात मंझावत कइसे आजु चली आइउ। जरूर कउनो छलु है।’ उनकी पुत्री ने कहा, अम्मा हमसे तो कहा गा ‘तुम्हार होब जाब हुइ रहा’ हम तुमका द्याखै सुनै आयेन।’ बहू की मां ने कहा, बिटिया हम तो सुना है तुम्हरे ससुर सगरा बनवाइन है वहिमा पानी नहीं आवत, कउनो का बलि दीन्ह जाई तो पानी आई। बिटिया तुम्हरेन साथे घात कीन्ह गा है तुम जल्दी लउटो।’

मां की ये बात सुनकर बहू तुरंत अपने ससुराल के लिए निकल पड़ी और रास्ते में रोती पीटती हरछठ मां की मनौती करती गई। रास्ते में उसने देखा कि जिस सागर को उनके ससुर ने बनवाया था अब वह जल से भर गया है। पुरइन पात लहरा रहे, वहीं एक बालक खेल रहा है। वह उसी सगरा की ओर दौड़ती हुई गई देखा तो यह तो उन्हीं का पुत्र था। बहू ने अपने पुत्र को गोदी में उठा लिया और उसे चूमने लगी। हरछठ माता को मनाने लगी क्योंकि उन्हीं की कृपा से आज उनका पुत्र जीवित था। जब वह घर आई तो उसने देखा कि घर का दरवाजा बन्द है। द्वार खुलवाया और कहने लगी,‘आजु तो सब जने हमरे लरिका का बलि चढ़ाय दीन्हेउ, हमका बहाने से मइके पठै दिह्यो। मुला आजु हमरे सत से औ हरछठ माता की दया से हमार गोदी फिर हरी भै। हमार लरिका तो वही सगरा मां खेलत रहा।’ सास ससुर अपने पोते को जीवित देख सुनकर बहुत खुश हुए और बहू के पैरों में गिरकर कहने लगे, आज तुम्हारी गोदी का बालक और हमारे कुल का दिया जगा। हरछठ माता ने जैसे हमारे दिन लौटाये वैसे ही सब का मंगल करें।

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