जबलपुर-कटनी में 500 करोड़ की जमीनों का मामला…
आदिवासियों की जमीन बिकवाई, चार आईएएस अफसरों पर केस….
2015 में हुई थी शिकायत, जांच के बाद एफआईआर…
भोपाल / मध्य प्रदेश के जबलपुर और कटनी में एक बडा मामला देखने को मिला जहां कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने भूमाफियाओं से मिलीभगत करते हुए आदिवासियों की करोड़ की जमीनें गैर- आदिवासियों की बेचने की मंजूरी देने के मामला सामने आने के बाद लोकायुक्त ने 4 आईएएस अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है…
पूरा मामला जबलपुर-कटनी का है जंहा कुछ आईएएस अफसरों ने आदिवासियों की जमीन पर बडा खेल करते है आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम कर दिया पूरा मामला आरटीआई की जानकारी में समाने आया है..
आदिवासी की जमीन गैर आदिवासियों को बेचने वाले चार आईएएस खिलाफ एफआरआई दर्ज..
इन आईएएस अफसर है दीपक सिंह, ओमप्रकाश श्रीवास्तव, बसंत कुरें, एमपी पटेल हैं। चारों अफसर 2006 से 2011 के बीच जबलपुर जिले में अपर कलेक्टर के पद पर कार्यरत थे। इसी दौरान आदिवासियों की जमीनें हेरफेर कर बेची गई।
आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों को बेचने के कुल 13 मामले …
इन आईएएस अफसर ने आदिवासी की जमीन गैर आदिवासियों के बचने के कुल 13 मामलों में करीब 50 हेक्टेयर से अधिक जमीनों का हस्तांतरण गैर आदिवासियों के नाम किया गया था,
भोपाल निवासी भुवनेश्वर प्रसाद मिश्रा ने इसकी शिकायत लोकायुक्त में की थी…
इस पूरे मामले की शिकायत भोपाल निवासी भुवनेश्वर प्रसाद मिश्रा ने इसकी शिकायत लोकायुक्त में की थी…मामलों का खुलासा 2013 से 2015 के बीच हुआ आरटीआई के जरिये हुआ। इसी आधार पर 2015 में लोकायुक्त की जबलपुर संभाग स्तरीय सतर्कता समिति इसकी जांच कर रही थी। इस समिति ने 13 फरवरी 2023 को जांच रिपोर्ट लोकायुक्त को सौंपी, जिसमें इस पूरे कांड को एक सुनियोजित भ्रष्टाचार बताया है
इन अफसरों पर लोकायुक्त की कार्रवाई
दीपक सिंह
ग्वालियर संभागायुक्त
ओपी श्रीवास्तव
आबकारी आयुक्त
बसंत करे
उप सचिव विधि विभाग
आदिवासियों के जरिये अफसरों का फर्जीवाड़ा
लोकायुक्त की एफआईआर के मुताबिक जमीन हस्तांतरण के इस मामले में चारों अफसरों ने कानून के उल्लंघन के साथ-साथ पद का दुरुपयोग किया। पूरे षडयंत्र में कुछ आदिवासी भी शामिल थे। मांगीलाल मरावी, जगदीश सिंह गोंड, समलू सिंह मरावी नाम के यह आदिवासी पहले छोटे-छोटे गरीब आदिवासियों की जमीन खुद खरीदते थे। एक डेढ़ साल बाद कभी आर्थिक तंगीं और कभी जमीन को एक हिस्से को बंजर
बताकर दूसरे हिस्से को उपानाऊ बनाने की लिए पैसे को जरूरत बताकर जमीन बेचने की मंजूरी का आवेदन अपर कलेक्टर के यहां लगाते थे। चारों अपर कलेक्टर बिना देरी के जमीनें बेचने के आदेश कर देते रहे। माघ लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 155 का खुला उल्लंघन कर यह जमीने बेची गई। ज्यादातर जमीनों को जबलपुर निवासी मीना अग्रवाल का परिवार और एक सत्यपाल दरियानी के परिवार ने खरीदा था।
सबसे ज्यादा मंजूरियां बसंत कुर्रे ने दी… कुल 13 प्रकरणों में…से सर्वाधिक 7 मंजूरियां अकेले बसंत कुरें ने जारी की थीं। इसके बाद 3 मामलों में ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने, 2 मामलों में एमपी पटेल और 1 मामले में दीपक सिंह ने जमीन हस्तांतरण की अनुमति दी थी…
छिंदवाड़ा जिले में आदिवासी की जमीन विक्रय हेतु अनुमति दिये जाने का भी खुल सकता है मामला..सूत्र..
आदिवासी बाहुल्य राज्य मध्यप्रदेश में आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी को अनुमति देने का मामला प्रतिबंध के बावजूद भी मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में कई वर्षों से जारी है। इसमें कुछ जिले तो कुख्यात और विख्यात हो चुके है। आदिवासियों की जमीन की खरीद फरोक्त करने वाले भूमाफियाओं का मकड़जाल मजबूती के साथ फैलता जा रहा है। आदिवासी की जमीन को गैर आदिवासी को बेचने की अनुमति देने
आईएएस अधिकारी ने पद का दुरूपयोग करते हुए दे रहे है आदिवासी की जमीन की विक्रय की अनुमति
छिंदवाड़ा में अधिकांश आदिवासियों की जमीन विवाह,शिक्षा, पक्का मकान बनाने के नाम पर दी गई अनुमति..
सूत्रो की जानकारी के अनुसार छिदंवाडा जिलें में भी आदिवासी की जमीन गैर आदिवासियों के नाम करने के कई मामले समाने आ रहे है और सब में एक ही कारण दर्शाकर आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम करने का सिलसिला जारी है जैसे शिक्षा, विवाह व मकान बनाने के नाम पर आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम कर दिया जा रहा है जबकि मध्यप्रदेश सरकार इलाज, शिक्षा,विवाह, मकान, व सुधार कार्य सहित अनिवार्य अन्य सुविधा दे रही सरकार तो क्यों आदिवासी की जमीन बेचने की दी जा रही अनुमति, जबकि सरकार इन आदिवासियों को
कृषि कार्य में बीज से लेकर कृषि यंत्र, सिंचाई के साधन व अन्य किसान सम्मान निधि, किसानों को अन्य राशि की सुविधा दी जा रही है। इसके बाद भी आखिर क्यों आदिवासी अपनी जमीन को बेचने की अनुमति मांग रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आदिवासी की जो क्रीम, उपजाऊ, प्लाटिंग वाली जमीन होती है उन्हें ही बेचने की अनुमति अनुमति दी जाती है। वहीं आयुषमान कार्ड, दीनदयाल उपचार योजना, मुख्यमंत्री के नाम पर एवं राज्य बीमारी सहायता योजना, सहित अन्य जन्म से लेकर मृत्यू तक हेतु उपचार व अंतिम संस्कार के लिये भी सरकार आर्थिक सहायता उपलब्ध करवा रही है। लाखों रूपये का उपचार करा रही है। वही शैक्षणिक कार्य के लिये प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च्च शिक्षा व विदेश में तक शिक्षा के लिए सरकार मदद कर रही है तो फिर क्यों बिक रही है आदिवासियों की जमीन…?