जनजाति विभाग में भ्रष्टाचार का खुला खेल,
छात्रावास भवन में रिनोवेशन बना कमीशन का एटीएम..?
जनजातीय विभाग के उपयंत्री –ठेकेदार की जोड़ी इन दिनों सुर्ख़ियों में,
छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ ) जनजाति विभाग इन दिनों विकास नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का पर्याय बनता जा रहा है। छात्रावास भवनों के रिनोवेशन के नाम पर विभागीय उपयंत्री और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने सरकारी खजाने को खुली लूट का अड्डा बना दिया है। हालात यह हैं कि काग़ज़ों में करोड़ों के काम पूरे हो चुके हैं, जबकि जमीनी हकीकत में छात्र आज भी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं आदिवासी बच्चें..!
जनजातीय विभाग के उपयंत्री की मेहरबानी ठेकेदारों पर कई बिलों का भुगतान काम के पहले ही…?
सूत्र बताते हैं कि विभाग में रिनोवेशन का ठेका मिलते ही बिल पहले और काम बाद में की परंपरा निभाई जा रही है। कहीं सिर्फ दीवारों पर सफेदी कर पूरे भवन के रिनोवेशन का भुगतान निकाल लिया गया, तो कहीं पुराने कार्यों को ही नया दिखाकर लाखों रुपए हजम कर लिए गए।
छात्रावासों में न तो बुनियादी सुविधाएं सुधरीं, न ही भवनों की हालत बदली, लेकिन फाइलों में सब कुछ “बेहतर” और “पूर्ण” दर्शा दिया गया। यह सब बिना विभागीय उपयंत्री की मेहरबानी के संभव नहीं माना जा रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उपयंत्री और ठेकेदारों के बीच पहले से तय कमीशन के खेल में आदिवासी छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया गया है। विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं, जिससे भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या शासन इस खुली लूट पर लगाम लगाएगा, या फिर जनजाति विभाग यूं ही भ्रष्टाचार का गढ़ बना रहेगा? अगर समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह मामला आने वाले दिनों में बड़ा घोटाला साबित हो सकता है।

