आदिवासी समाज के बच्चों के हक में डाका डाल रहे अधीक्षक….गरीब बच्चों की थाली में सेंधमारी…!

Chautha Sthambh

भगवान भरोसे पढ़ रहे परतापुर आदिवासी छात्रावास के बच्चे…..

By admin -16/01/2026

चौथा स्तंभ (छिंदवाड़ा) जनजाति कार्य विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों में आदिवासी बच्चों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है, जंहा न तो मेन्यू के हिसाब से भोजन मिलता है और ना ही सुरक्षित भवन. ये हाल छिंदवाड़ा जिले के उस छात्रावास का है, जंहा के विधायक भी आदिवासी समुदाय से आते हैं..
जी हाँ हम बात कर रहे है परतापुर आदिवासी बालक छात्रावास में पढने वाले छात्रों को चपरासी के भरोसे छोड दिया गया है..

यहां छात्रावास में करीब 45 छात्र रहते हैं जिनके भोजन आवास और अन्य खर्च सरकार देती है लेकिन उसमें भी सेंध लगाकर बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है
छात्रों की मानें तो छात्रावास में मीनू के हिसाब से हर दिन अलग-अलग भोजन देने का नियम है लेकिन यह सिर्फ आलू की सब्जी और चावल देकर छात्रों के साथ छलावा किया जाता है इतना ही नहीं हर छात्रावास में रात को अधीक्षक के सोने के नियम है लेकिन रात में एक चपरासी छात्रावास में सोता है अधीक्षक रविशंकर डेहरिया आपने धर चले जाते है और एक दो दिन बाद ही छात्रावास आना-जाना करते हैं

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  • छात्रावास में बच्चों को साबुन तेल टूथपेस्ट जैसे सामान भी सरकार की ओर से देने का नियम है लेकिन इस छात्रावास में छात्र खुद अपने पैसे खर्च कर सामान दुकान से लाना पड़ता है आप है कि हॉस्टल अधीक्षक जो बच्चों के खातों में पैसे डालते है वो भी वापस ले लेता है..

    छात्रावासों में रह रहे आदिवासी बच्चों के निवाले पर जिम्मेदार लगातार सेंध…

    छात्रावासों में रह रहे आदिवासी बच्चों के निवाले पर जिम्मेदार लगातार सेंध लगा रहे हैं। बच्चों के हक का अनाज और पैसा अफसरों और अधीक्षकों की जेब भर रहा है।
    छात्रावासों में प्रति छात्र 1650 रुपए की शिष्यवृत्ति आती है। इसमें से कुछ रुपए अधीक्षक के पास बच्चों के भोजन और जरूरतों के लिए जाते हैं, जबकि बाकी रुपए सामग्री खरीद के नाम पर जिला कार्यालय रोक लेता है। इन्हीं रुपए प्रति छात्र की राशि में सबसे बड़ा खेल होता है।

    अधीक्षक रविशंकर डेहरिया कुछ मीडिया कर्मियों के समक्ष गिड़गिड़ाते नजर आ रहे हैं…

    छात्रावास में रहते है कम बच्चे
    परतापुर छात्रावास अधीक्षक रविशंकर डेहरिया की लापरवाही एंव बच्चों को प्रताड़ित करने के कारण आधे से कम बच्चों छात्रावास में रहते है। जब छात्रावास का कुछ मीडिया कर्मियों के द्वारा निरीक्षण किया गया तो यंहा मात्र 15 से 20 बच्चों ही छात्रावास में मिले मीडिया कर्मियों के द्वारा जब बच्चों की उपस्थिति पंजीयन देखी गई तो अधीक्षक ने 7 दिन बाद पूरे बच्चों की उपस्थिति दर्ज तो अब समझ सकते हो कि छात्रावास में कैसी होगी व्यवस्था..!

    अधीक्षक ने छात्रावास में किया था लाखों का गबन….?

    पहला मामला…

    परतापुर अधीक्षक रविशंकर डेहरिया द्वारा जनवरी से मार्च तक की राशि 351771 का आहरण किया गया जबकि टेबलेट के आधार पर व्यय 180851.40पैसे होता है लेकिन अधीक्षक रविशंकर डेहरिया के द्वारा बिना उच्च अधिकारी की अनुमति लिए राशि 170919 का अधिक आहरण कर राशि डंकार गया जबकि छात्रावास अधीक्षक ने 136071 की राशि नगद आहरित की थी जिसके लिए छात्रावास अधीक्षक अधिकृत नहीं होता है जिसके बाद भी फर्जी तरीके से राशि निकाली गई…
    दुसरा मामला…

    बिना बिल के पेयजल की राशि में भी डांका…

    परतापुर के अधीक्षक रविशंकर डेहरिया के द्वारा बिना बिल के पेयजल की राशि 9000 की जो 24 दिसबर को पेयजल के लिए जमा हुई थी, अधीक्षक रविशंकर डेहरिया ने बिना बिल के चेक क्रंमाक 404325 से राशि निकल लिए ऐसे और भी मदों से अधीक्षक ने फर्जी तरीके से राशि का आहरण किया….

    भ्रष्टाचारियों को बचा रहे जनजाति विभाग के अधिकारी…?

    जनजाति विभाग के अधिकारी पर उठे सवाल..!
    हारी विकासखंड के परतापुर आदिवासी बालक छात्रावास के अधीक्षक के द्वारा लाखों रुपए का गवर्नर होने के बाद भी सहायक आयुक्त कार्यालय के द्वारा आज दिनांक तक अधीक्षक रवि शंकर डेरी पर कोई कार्रवाई नहीं करना कई सवालों को पैदा करता है आखिरकार किसके दबाव पर अधीक्षक रवि शंकर डेहरिया को निलंबित नही किया गया एंव लाखों के गबन करने वाले अधीक्षक पर एफआरआई दर्ज नहीं कराई गई। जबकि विभाग द्वारा जो जांच दल बनाया गया था उसमें जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट गबन का उल्लेख किया गया था कि छात्रावास अधीक्षक रवि शंकर डेहरिया के द्वारा फर्जी तरीके से शासन की राशि का आहरण कर गबन किया गया है लेकिन उसके बाद भी सहायक आयुक्त ने कोई कार्रवाई नहीं कि..

    विभागीय जांच प्रतिवेदन में प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने के बाद भी कार्यवाही नहीं…?

    परतापुर छात्रावास में अधीक्षक के द्वारा लाखों रुपए की राशि का गबन किया गया है जो जांच प्रतिवेदन में प्रथम दृष्टया सिद्ध होता है फिर भी सहायक आयुक्त ने ऐसे दोषी अधीक्षक को अभी तक न ही निलबिंत किया है न ही ऐसे दोषी अधीक्षक पर एफआरआई की गई है जबकि जांच में कर्मचारी प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए, जिन पर एफआईआर दर्ज करवाई जानी चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या लाखों का गबन करने वाला जिम्मेदार अधीक्षक बच जाएंगे? क्या इस भ्रष्टाचार के असली सूत्रधारों पर भी कार्रवाई होगी? सरकार अगर वाकई आदिवासी बच्चों के पेट में निवाला और शिष्यवृत्ति पहुंचाना चाहती है तो इस पूरे सिस्टम की सफाई जरूरी है। वरना ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे और बच्चों का हक अफसरों की थाली में जाता रहेगा…!

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