छिंदवाड़ा के सरकारी स्कूलों में कागज़ी प्रयोगशालाएँ: लाखों की राशि खर्च, छात्रों को नहीं मिल रहा प्रायोगिक ज्ञान..

Chautha Sthambh

छिंदवाड़ा के सरकारी स्कूलों में कागज़ी प्रयोगशालाएँ: लाखों की राशि खर्च, छात्रों को नहीं मिल रहा प्रायोगिक ज्ञान
छिंदवाड़ा(चौथा स्तंभ) छिंदवाड़ा जिले के सरकारी स्कूलों में प्रयोगात्मक शिक्षा की हकीकत चौंकाने वाली है। कागज़ों में सुसज्जित बताई जा रही प्रयोगशालाएँ ज़मीनी स्तर पर बदहाल पड़ी हैं। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा छात्रों को किताबी ज्ञान के साथ प्रायोगिक शिक्षा देने के लिए लैब की व्यवस्था तो की गई, लेकिन अधिकांश स्कूलों में यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।ऐसा ही देखने को मिला चौरई विकासखंड के हायर सेकेंडरी स्कूल बीझांवाडा में जंहा अभी अभी स्कूल के कमरों में पेंट कर दिखाया गया है यंहा कौन कौन सी प्रयोगशाला है, जबकि आज तक बच्चों को इसमें कोई प्रैक्टिकल नहीं कराए गए हैं… ऐसे सिर्फ एक स्कूल नहीं जिलें के अधिकांश स्कूल के निरीक्षण के दौरान कई स्कूलों में प्रयोगशालाएँ या तो बंद मिलीं या उनमें उपकरण धूल खा रहे थे। नतीजा यह है कि छात्र-छात्राओं को पूरे सत्र में नियमित प्रैक्टिकल का लाभ नहीं मिल पा रहा। ज्यादातर स्कूलों में केवल परीक्षा से ठीक पहले औपचारिक प्रैक्टिकल कराए जाते हैं, जिससे छात्रों का वैज्ञानिक आधार कमजोर होता जा रहा है। खुद विभागीय अधिकारी मानते हैं कि प्रायोगिक शिक्षा पूरे सत्र में नियमित रूप से होनी चाहिए।

लैब के नाम पर हर साल लाखों की राशि
जानकारी के अनुसार, शिक्षा विभाग द्वारा प्रत्येक स्कूल को प्रयोगशाला सामग्री के लिए प्रतिवर्ष लगभग 25 हजार रुपए और पुस्तकालय के लिए 10 हजार रुपए की राशि दी जाती है। इसके अलावा कक्षा 9वीं–10वीं के छात्रों से 30 रुपए विज्ञान शुल्क और 11वीं–12वीं के छात्रों से 80 रुपए प्रति छात्र वसूले जाते हैं।
इतनी राशि मिलने के बावजूद जब स्कूलों में लैब की हालत जर्जर है, तो बड़ा सवाल उठ रहा है कि यह पैसा आखिर खर्च कहाँ हो रहा है? विभागीय सूत्रों के मुताबिक अब कई स्कूलों में लैब और लाइब्रेरी मद की राशि के उपयोग की जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।
रखरखाव में लापरवाही, जवाबदेही तय नहीं
स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रयोगशालाओं के रखरखाव में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। कई जगह उपकरण खराब पड़े हैं, रसायन सामग्री अनुपयोगी हो चुकी है और रिकॉर्ड संधारण भी अधूरा है। शासन से मिलने वाली राशि और छात्रों से वसूले गए शुल्क का पारदर्शी हिसाब नहीं होने से पूरे मामले में गड़बड़ी की आशंका गहरा रही है।
चलित प्रयोगशाला भी बनी औपचारिकता?
प्रयोगात्मक शिक्षा को मजबूत करने के लिए विभाग ने चलित प्रयोगशाला (मोबाइल लैब) की भी शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य उन स्कूलों तक विज्ञान प्रयोग पहुंचाना था जहाँ स्थायी लैब की सुविधा नहीं है। चार पहिया वाहन में रसायन, उपकरण और प्रयोग सामग्री उपलब्ध कराई गई है, ताकि भौतिकी और रसायन शास्त्र के प्रयोग मौके पर कराए जा सकें।
लेकिन जमीनी स्तर पर इस योजना का उपयोग भी सीमित नजर आ रहा है। कई शिक्षकों का कहना है कि चलित प्रयोगशाला की नियमित मॉनिटरिंग नहीं होने से इसका लाभ सभी स्कूलों तक नहीं पहुंच पा रहा।
जांच और जवाबदेही की मांग
शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि यदि प्रयोगशालाओं पर खर्च हो रही सरकारी राशि का सही उपयोग हो, तो सरकारी स्कूलों के छात्र भी निजी स्कूलों की तरह मजबूत प्रायोगिक ज्ञान हासिल कर सकते हैं। ऐसे में जरूरत है कि शिक्षा विभाग स्कूलवार ऑडिट कराए, जिम्मेदार अधिकारियों और प्रबंधन की जवाबदेही तय करे और प्रयोगात्मक शिक्षा को कागज़ों से निकालकर जमीन पर उतारे।
जब तक लैब कागज़ों से निकलकर कक्षाओं तक नहीं पहुंचेगी, तब तक सरकारी स्कूलों में विज्ञान शिक्षा अधूरी ही रहेगी।

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