उच्च प्रभार में बड़ा खेल? छात्रावास अधीक्षिका को उसी जगह प्रमोशन, नियमों को ताक पर रखने का आरोप
छिंदवाड़ा(चौथा स्तंभ) जनजातीय कार्य विभाग में उच्च पद प्रभार को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने विभागीय पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्योंकि जनजाति विभाग ने वर्ष 14/03/2024 में छिंदवाड़ा जिलें के प्राथमिक शिक्षक को उच्च पद प्रभार (माध्यमिक शिक्षक) दियें जाने हेतु निर्देशित किये जाने से कार्यालयीन आदेश क्रमांक/588,590,592 दिनांक 05/02/2024 से जिला छिंदवाड़ा के क्रमशः संस्कृत अंग्रेजी एंव गणित बिषय का उच्च पद प्रभार दिया गया था जिसमें नोडल अधिकारी के द्वारा छिंदवाड़ा जिलें के संबंधित विभागीय प्राथमिक शिक्षक से प्राप्त अभिलेख सत्यापन अनुसार निम्नानुसार संस्था में माध्यमिक शिक्षक के उच्च पद प्रभार दिया गया था लेकिन इसमें शिक्षकों के प्राप्त अभिलेख में गलत जानकारी देकर कई शिक्षक/शिक्षिका को उसी जगह में उच्च प्रभार दे दिया गया जंहा पहले ही पदस्थ थे,
प्राथमिक शिक्षकों को माध्यमिक शिक्षक का उच्च प्रभार देने की प्रक्रिया में नियमों की खुली अनदेखी
आरोप है कि प्राथमिक शिक्षकों को माध्यमिक शिक्षक का उच्च प्रभार देने की प्रक्रिया में नियमों की खुली अनदेखी करते हुए जिला मुख्यालय के कान्या शिक्षा परिसर में संचालित छात्रावास में पदस्थ अधीक्षिका को उसी स्थान पर प्रमोशन का लाभ दे दिया गया।
जानकारी के मुताबिक संबंधित शिक्षिका पहले से ही एक आदिवासी छात्रावास में अधीक्षिका के रूप में पदस्थ थीं। विभागीय आदेश के तहत उन्हें माध्यमिक शिक्षक का उच्च पद प्रभार दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उच्च प्रभार मिलने के बाद भी उन्हें किसी विद्यालय में पदस्थ करने के बजाय उसी छात्रावास में बनाए रखा गया। विभागीय सूत्रों का कहना है कि उच्च प्रभार का उद्देश्य स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करना है, न कि एक ही स्थान पर पद और लाभ सुरक्षित रखना।
इस पूरे घटनाक्रम में जिला स्तर पर हुए अभिलेख सत्यापन की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप लग रहे हैं कि सत्यापन प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई या फिर जानबूझकर नियमों को नजरअंदाज किया गया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक पदस्थापना का मामला नहीं बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली में संभावित मिलीभगत का संकेत माना जाएगा।
शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस तरह के फैसले न सिर्फ अन्य पात्र शिक्षकों के साथ अन्याय हैं, बल्कि पूरे सिस्टम में गलत संदेश भी देते हैं। कई शिक्षकों में इस फैसले को लेकर नाराजगी बताई जा रही है, क्योंकि वे लंबे समय से नियमानुसार पदस्थापना की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनजातीय कार्य विभाग इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब होगा? या फिर यह मामला भी विभागीय फाइलों में दबकर रह जाएगा? फिलहाल विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह प्रकरण प्रशासनिक जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।
