आदिवासी कान्या आश्रम में दूषित पानी पीने को मजबूरआदिवासी छात्राएं!…

Chautha Sthambh

आदिवासी कान्या आश्रम में दूषित पानी पीने को मजबूर
आदिवासी छात्राएं!…

टैकर से लाया जा रहा पानी, बारिश का दूषित पानी पीने के आखिर क्यों मजबूर छात्राएं….

लाखों रुपये के टेंकर से पानी लाने के फर्जी बिल लगते है…

छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ )जिलें में जनजातीय विभाग द्वारा संचालित आदिवासी छात्रावास आश्रम शालाओं की स्थिति कभी खराब है, यंहा रहने वाले बच्चों को न अच्छा भोजन मिल रहा है न स्वच्छ पानी आखिर कब तक इन आदिवासी छात्राएं की जिंदगी से खिलवाड़ करते रहेगा विभाग….

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  • सरकार ने आदिवासी इलाकों में छात्रावास आश्रम तो बना दिया लेकिन देखरेख का अभाव…

    तामिया के भौडियापानी कन्या आश्रम में दूषित पानी पी रही है छात्राएं…

    जिलें के आदिवासी इलाकों में शासन ने छात्रावास और आश्रम तो बना लिए लेकिन उनकी स्थितियों को देखकर अधिकारियों की लापरवाही का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसका ताजा उदाहरण तामिया के भौडिया पानी में सामने आया, यहां पर स्कूल और गांव से कुछ दूरी पर बनाए गए कन्या आश्रम की छात्राएं इन दिनों पानी को लेकर परेशान है। बताया जा रहा है कि शासन ने यहां पर पानी की टंकी तो बना दी लेकिन इसमें पानी कहां से आएगा इसका कोई पता नहीं है। ऐसे में छात्राएं परेशान होती रहती है। इस दिशा में न तो शासन का ध्यान है और न ही किसी अन्य अधिकारियों का।

    जिले के आदिवासी आश्रम में बालिकाएं पानी के लिए तरस रही है। हालात ये है कि टैंकर से पानी मंगवा कर काम चलाया जा रहा है। भौडिया पानी के नवीन कन्या आश्रम में नजर आए इन हालातों ने साफ कर दिया कि आदिवासी छात्राओं को लेकर अधिकारी कितने गंभीर है।

    जानकारी के अनुसार गांव और स्कूल से दूर बने इस आश्रम में तकरीबन पचास बालिकाएं निवास करती है। इन्हें भोजन भी अच्छा नही मिलता है न ही पीने का स्वच्छ पानी,बताया जा रहा है कि जो पानी टैंकरों से यहां लाया जाता है वह कुएं का होता है। कुंए का पानी कितना अच्छा है और कितना दूषित इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पानी को सीधे बच्चे पीने के उपयोग में लेते हैं। जिसके कारण उनकी सेहत बिगड़ने का खतरा बना हुआ है। बारिश में पानी की किल्लत से साफ है कि गर्मियों की शुरुआत में बच्चों के क्या हाल होंगे। लोगों ने बताया कि कुछ बालिकाओं की सेहत पर इसका असर भी हुआ था, लेकिन पानी की समस्या पर किसी ने कोई ध्यान देना उचित नहीं समझा। बहरहाल इस क्षेत्र के आदिवासी आश्रम के अलावा और भी आश्रमों की स्थिति पर ध्यान देने की आवश्यकता है।जबकि सरकार के द्वारा इन्हे तमाम सुविधाएं यहां दी जाती है। सरकारी योजनाओं के अनुसार इन छात्राओं को किसी भी तरह की परेशानियां नहीं होनी चाहिए, बावजूद इसके यहां पर पानी के कोई इंतजाम नहीं है। ऐसे में छात्राएं किसी तरह अपना काम चला रही है। जानकारों का कहना है कि छात्राएं इस मामले में किससे क्या कहे वे समझ नहीं पा रही है। आश्रम की अधीक्षिका भी इस ओर ध्यान नहीं देती है। बताया जा रहा है कि आश्रम के पास पानी की टंकी बनाई गई लेकिन उसमें पानी कहा से लाया जाए इसके कोई इंतजाम नहीं..

    जनजातीय विभाग के अधिकारी नहीं आते किसके पास जाएं…

    इस मामले में न केवल
    बालिकाएं बल्कि वहां के ग्रामीण भी परेशान है। जिस परिवार की बालिकाएं इस आश्रम में रह रही है वे इसलिए भी परेशान है कि यहां पर अधिकारी आते नहीं, जिससे समस्याओं को बताया जा सकें। इस समस्या का हल खुद आश्रम की अधीक्षिका के पास भी नहीं है। ऐसे में वे किसके पास जाएं समझ से परे है। ग्रामीणों की मानें तो कभी कभार कुछ लोग निरीक्षण के नाम पर पहुंचते है लेकिन सुधार के नाम पर कुछ देखने को नहीं मिला है। तकरीबन दो सालों से इस टंकी में पानी नहीं भरा है, ऐसे में टैंकर से ही काम चलाना प्रबंधन की मजबूरी हो गई है। इस ओर न तो पीएचई विभाग का ध्यान है और न ही विभाग के अधिकारियों का।

    भौडियापानी कान्या आश्रम में दस सालों से शिक्षिका बन बैठी है अधीक्षिका…

    जनजातीय विभाग के अधिकारी कभी इस ओर ध्यान नही देते है कि कौन सी अधीक्षिका आश्रम शाला में काम ठीक कर रही है या नहीं आज जिलें के छात्रावास एंव आश्रम शालाओं में पदस्थ है उन्हें कभी हटाने की कोशिश जिलें में बैठे अधिकारी नहीं करते है जबकि शासन 3 साल से ज्यादा किसी भी शिक्षक/ शिक्षिकाओं को अधीक्षक के पद पर पदस्थ ना किया जाए और 3 साल होने को उपरांत उन्हें उनकी मूल शाला वापस किया जाए लेकिन जिलें में बैठे सहायक आयुक्त शासन के नियम की अनदेखी करते नजर आ रहे हैं…

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