प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से बदली श्रीमती सरिता सिंगारे के जीवन की दिशा….
साल भर में 10 टन मछली उत्पादन से कमा रही हैं 8 लाख रूपये तक की आय….
बायो फ्लॉक तकनीक के नवाचार से बढ़ी अतिरिक्त आय, नई पहचान भी मिली….
छिन्दवाड़ा(चौथा स्तंभ) जिले के विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम खुनाझिर खुर्द की श्रीमती सरिता सिंगारे आज मत्स्य पालन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। वे पहले तालाब और जलाशयों में पारंपरिक तरीके से मछली पालन करती थीं, जिससे उन्हें लगभग ₹30,000 प्रति माह की आय होती थी। सीमित संसाधनों और पारंपरिक तकनीक के कारण आय में अधिक वृद्धि संभव नहीं हो पा रही थी।


वर्ष 2020 में श्रीमती सरिता ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत बायो फ्लॉक तकनीक से मत्स्य पालन करने के लिए मत्स्य विभाग में आवेदन किया। योजना के तहत ₹7.50 लाख की इकाई लागत में से ₹4.50 लाख का अनुदान प्राप्त हुआ। इस सहयोग से उन्होंने अपनी निजी भूमि पर बायो फ्लॉक प्रणाली स्थापित की और आधुनिक तकनीक को अपनाया।
बायो फ्लॉक तकनीक अपनाने के बाद उनके मत्स्य पालन व्यवसाय में क्रांतिकारी बदलाव आया। आज श्रीमती सरिता प्रति वर्ष लगभग 10 टन मछली का उत्पादन कर रही हैं, जिससे उनकी वार्षिक आय 7 से 8 लाख रूपये तक पहुँच गई है। यह उनके लिए आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत आधार बनी।
श्रीमती हेमा सिंगारे खूनाझिर खुर्द
इतना ही नहीं, श्रीमती सरिता ने नवाचार की दिशा में भी कदम बढ़ाया। वे बरसात के मौसम में बायो फ्लॉक तकनीक के माध्यम से मछलियों का प्रजनन और मत्स्य बीज का उत्पादन भी कर रही हैं। उत्पादित मत्स्य बीज को आसपास के कृषकों को विक्रय कर वे अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं, जिससे उनकी आमदनी और अधिक बढ़ गई है।
श्रीमती सरिता सिंगर खूनाझिर खुर्द
श्रीमती सरिता सिंगारे की सफलता की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि सही योजना, आधुनिक तकनीक और मार्गदर्शन के साथ कोई भी व्यक्ति अपने व्यवसाय को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना ने उन्हें न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि उनके मत्स्य पालन व्यवसाय को एक नई पहचान और दिशा भी दी है।
गांव हो या शहर, अब इस नई तकनीक से शुरू करें मछली पालन का स्टार्टअप,
कम लागत से होगी बंपर कमाई
बदलते समय और घटते जलस्तर के बीच किसानों के लिए अब मछली पालन की पारंपरिक पद्धति से हटकर नई तकनीकों पर ध्यान देना जरूरी हो गया है. आज के दौर में तालाबों में मछली पालन करना किसानों के लिए आसान नहीं रह गया है. एक ओर पानी की कमी है, तो दूसरी ओर भूमि सीमित होने से बड़े तालाब बनाना संभव नहीं हो पाता. ऐसे में किसानों के लिए बायोफ्लॉक और सेमी बायोफ्लॉक टेक्नोलॉजी सबसे बेहतर विकल्प बनकर उभरी है.
इस तकनीक में छोटे-छोटे टैंकों के माध्यम से हाई डेनसिटी में मछली पालन किया जाता है. इसमें पारंपरिक तालाब की आवश्यकता नहीं होती और किसान अपनी जमीन पर सीमित जगह में भी मछली पालन शुरू कर सकते हैं. यही कारण है कि यह तकनीक किसानों और युवाओं के बीच स्टार्टअप मॉडल के रूप में बहुत पसंद किया जा रहा है.

अगर किसी के पास 1500 से 2000 स्क्वेयर फीट का क्षेत्र है तो वह आसानी से बायोफ्लॉक सेटअप लगाकर मछली पालन शुरू कर सकता है. एक टैंक पूरी तरह तैयार करने पर जिसमें एरियेशन फिटिंग, फिश फीड और फिश सीड शामिल है. यह लगभग एक लाख रुपए की लागत आती है खास बात यह है कि इसके लिए सरकार की ओर से किसानों को सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जाती है.

भारत सरकार की इस योजना के तहत एससी, एसटी और महिला मछली पालक को 60 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है. वहीं, सामान्य और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को 40 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ मिल सकता है. किसान अपने स्थानीय ब्लॉक स्तरीय मत्स्य पालन विभाग से संपर्क कर इस योजना का फायदा उठा सकते हैं.

किसान कम लागत में मछली पालन का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं. पारंपरिक तालाब की तुलना में इसमें पानी की आवश्यकता भी कम होती है और उत्पादन अधिक मिलता है. यही वजह है कि बायोफ्लॉक तकनीक को आने वाले समय में छोटे किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए मछली पालन का सबसे कारगर और लाभकारी स्टार्टअप माना जा रहा है.

