आदिवासी छात्रावास असुरक्षित: लापरवाह अधीक्षक, मौन अधिकारी और बार-बार दोहराती त्रासदी

Chautha Sthambh

आदिवासी छात्रावास असुरक्षित: लापरवाह अधीक्षक, मौन अधिकारी और बार-बार दोहराती त्रासदी
छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ)। जनजाति कार्य विभाग द्वारा संचालित आदिवासी छात्रावास और आश्रम शालाएं इन दिनों सुरक्षा के गंभीर संकट से गुजर रही हैं। जिले के कई छात्रावासों में अधीक्षक नियमों के बावजूद रात्रि निवास नहीं कर रहे, जिससे बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। लगातार सामने आ रही घटनाएं विभागीय लापरवाही की खौफनाक तस्वीर पेश कर रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी सवालों के घेरे में है।विगत बरसों में हुई धटना जैसे हर्रई के परतापुर छात्रावास में अज्ञात लोगों द्वारा घुसकर छात्र पर चाकू से हमला किए जाने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। सोनपुर छात्रावास में एक छात्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत और जिला मुख्यालय स्थित कन्या बालिका आश्रम में नाबालिग बच्ची द्वारा आत्मघाती कदम उठाने की घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया। इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि छात्रावासों में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था बेहद कमजोर है और जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं दिख रहा।


निलंबन के बाद फिर कुर्सी: सवालों में झिलमिली छात्रावास का अधीक्षक
चौरई छात्रावास से जुड़ा मामला विभागीय कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आरोप है कि चौरई में पदस्थ रहते हुए अधीक्षक पर बच्चों के राशन में गड़बड़ी और राशन बेचने के गंभीर आरोप लगे थे, जिसके चलते उन्हें निलंबित किया गया। हैरानी की बात यह है कि उसी अधिकारी को दोबारा झिलमिली आदिवासी बालक छात्रावास का प्रभार सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित मिलीभगत का संकेत है। यदि विवादित अधिकारी को फिर से संवेदनशील जिम्मेदारी दी जा सकती है, तो बच्चों की सुरक्षा को लेकर विभाग की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या 24 घंटे बैठा रहेगा अधीक्षक?”— विभागीय तर्क पर उठे सवाल
जब छात्रावासों में अधीक्षकों की अनुपस्थिति को लेकर क्षेत्र संयोजक श्री बोरकर से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि अधीक्षकों के पास अन्य विभागीय कार्य भी होते हैं और वे 24 घंटे छात्रावास में नहीं रह सकते। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट तस्वीर दिखाती है। झिलमिली, चौरई और अन्य छात्रावासों में अधीक्षकों की नियमित अनुपस्थिति की शिकायतें सामने आ रही हैं। कई स्थानों पर दिन में भी अधीक्षक नदारद मिले। कर्मचारियों का कहना है कि अधीक्षक कई दिनों से छात्रावास नहीं आए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब निगरानी करने वाले अधिकारी ही अधीक्षकों की ढाल बन जाएं, तो जवाबदेही किससे तय होगी?


कब जागेगा प्रशासन?
लगातार गंभीर घटनाओं के बावजूद न तो रात्रि निवास की अनिवार्यता सख्ती से लागू हो रही है और न ही दोषी अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई दिखाई दे रही है। अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और छात्रावासों में 24 घंटे निगरानी व्यवस्था लागू करने की मांग की है।
अब सवाल यह नहीं रह गया कि घटनाएं क्यों हो रही हैं। असली सवाल यह है—क्या प्रशासन किसी और मासूम की जिंदगी दांव पर लगने का इंतजार कर रहा है? यदि अब भी व्यवस्था नहीं जागी, तो आने वाले दिनों में यह लापरवाही और बड़ी त्रासदी को जन्म दे सकती है।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *