सरकारी स्कूल में पढ़ाई की जगह बच्चे धो रहे थाली…स्कूल शिक्षक की बडी लापरवाही…?

Chautha Sthambh

स्कूल में पढ़ाई की जगह बच्चे धो रहे थाली…
स्कूल शिक्षक की बडी लापरवाही…?

हैंड पंप पर लाइन लगाकर बर्तन लेकर खड़े हुए बच्चे, धोने लगे प्लेट- गिलास….

रिपोर्ट-ठा. रामकुमार राजपूत

छिंदवाड़ा (चौथा स्तंभ) मध्य प्रदेश में इन दिनों मिड डे मील मजाक बनकर रह गया है, बच्चों को मिलने वाला भोजन भी गुणवत्ताहीन रहता है लेकिन देखने वाला कोई नही…
ऐसा ही मामला देखने को मिला हर्रई विकासखंड के शासकीय माध्यमिक शाला बूढेना (भौंड) जन शिक्षा केंद्र हर्रई से एक चिंताजनक मामला सामने आया है जंहा स्कूल में बच्चों को शिक्षा देने की बजाय उनसे मिड डे मील के बर्तन धुलवाए जा रहे हैं..

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  • स्कूल के बच्चों से बर्तन धुलवाते हुए वीडियो…

    जंहा सरकार बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके इसके लिए सरकार ने बच्चों को आकर्षित करने के लिए मिड डे मील जैसी योजना संचालित की है लेकिन छिंदवाड़ा जिलें के हर्रई में इसका उल्टा देखने को मिला रहा है.. वीडियो में दिख रहा है कि मध्याह भोजन के बाद छोटे छोटे बच्चों पढाई छोड़ बर्तन धो रहे हैं, सभी बच्चों अपनी थालियां लेकर सरकारी नल पर कतार में खडे है, वे एक एक करके अपने बर्तन धो रहे हैं यह दृश्य किसी स्कूल की बजाय ढाबे या होटल जैसा लग रहा है…

    स्कूल शिक्षक का क्या कहना…
    जब स्कूल के बच्चों से बर्तन धुलने के मामले में स्कूल शिक्षक से पूछा गया तो उनका कहना है कि समूह वाली महिला बच्चों से बर्तन धुलने का काम करती है तो मैं क्या मैं क्या करूं जबकि पूरे स्कूल के बच्चों शिक्षक के सामने बर्तन धो रहे थे लेकिन शिक्षक ने कुछ नही बोला ये बडी धटना है…

    सरकार की क्या है गाइडलाइन…
    मध्य प्रदेश शासन के स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी स्कूल में बच्चों से इस तरह का काम नहीं कराया जा सकता यह कानून का उल्लंघन है बच्चों से मजदूरी करना दंडनीय अपराध है

    स्कूल प्रशासन पर होना चाहिए बाल श्रम कानून का उल्लंघन का मामला दर्ज…

    जिलें के सरकारी स्कूल में बच्चों से काम करने का यह मामला पहला नहीं है ऐसे अनेकों मामले देखने को मिल रहे हैं जहां स्कूल प्रबंधन बच्चों से काम करते देखे जा सकते हैं ऐसे स्कूल प्रबंधन की यह कार्रवाई बाल श्रम कानून का भी उल्लंघन है बच्चों को पढ़ाई की उम्र में किताबों की बजाय बर्तन धोने के लिए मजबूर किया जा रहा है यह मामला शिक्षा विभाग की कार्य प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है लेकिन जिलें में बैठे अधिकारी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की गरीब आदिवासी के बच्चे पढ़ाई करें या ना करें…

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