भुजलिया पर्व- प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव

Chautha Sthambh

भुजलिया पर्व- प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव

(चौथा स्तंभ )अच्छी बारिश, फसल एवं सुख-समृद्धि की कामना के लिए रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजलिया पर्व मनाया जाता है। श्रावण मास की पूर्णिमा रक्षाबंधन के अगले दिन भुजलिया पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुखलेष रूप से बुंदेलखंड का लोकपर्व है। इसे कजलियों का पर्व भी कहते हैं। शुक्रबार को भुजलिया धूमधाम से मनाया जाएगा। कजलियां पर्व प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा है। आइये जानते हैं इस पर्व के बारे में सब कुछ। जल स्त्रोतों में गेहूं के पौधों का विसर्जन किया जाता है। सावन के महीने की अहमी और नवमीं को छोटी- खेटी बांस की टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जी के दाने बोए जाते हैं। इसके बाद इन्हें रोजाना पानी दिया जाता है। सावन के महीने में इन भुजलिया को झूला देने का रिवाज भी है। तकरीबन एक सप्ताह में ये अना उग आता है, जिन्हें भुजरियां कहा जाता है।

जरियों की पूजा का महत्व

इन भुजालिया की पूजा अर्चना की जाती है एवं कामना की जाती है, कि इस साल बारिश बेहतर हो जिससे अच्छी फसल मिल सकें। श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजलिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन इन्हें एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद देते हैं। बुजुर्गों के मुताबिक में भुजलिया नई फसल का प्रतीक है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाएं इन टोकरियों को सिर पर रखकर जल स्त्रोतों में विसर्जन के लिए ले जाती हैं।

यह है भुजलिया की कया

इसकी कथा आल्हा की बहन चंदा से जुड़ी है। इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है। आल्हा की बहन चंदा आवण माह से ससुराल से भायके आई तो सारे नगरवासियों ने कजलियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के सिंह सपूतों आल्हा ऊदल-मलखान की वीरता आज भी उनके वीर रस से परिपूर्ण गाथाएं बुदेलखंड की धरती पर बड़े चाव से सुनी व समझी जाती है। बताया जाता है कि महोबे के राजा के राजा परमाल, उनकी बिटिया राजकुमारी चन्द्रावलि का

अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोने पे चड़ई कर दी थी। राजकुमारी उस समय तालाब में कजली सिराने अपनी सखी सहेलियन के साथ गई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज हाथ न लगाने पाए इसके लिए राज्य के बीर बांकुर (महोबा) के सिंह सपूतों आल्हा ऊदल-मलखान की वीरतापूर्ण पराक्रम दिखलाया था। इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलिकाममेरा भाई अभाई भी उई से

जा पहुंचे। कीरत सागर ताल के पास में होने वाली ये लड़ाई में अई बौरगति को प्यारा हुआ, राजा परमाल को एक बेटा रंजीत शहीद हुआ। बाद में आल्हा, ऊदल, लाखन, ताल्हन, सैयद राजा परमाल का लड़‌का ब्रहमा, जैसें वीर ने पृथ्वीराज की सेना को वहां से हरा के भगा दिया। महोबे की जीत के बाद से राजकुमारी चन्द्रवलि और सभी लोगों अपनी-अपनी कजिलयन को खोंटने लगी। इस घटना के बाद से

महोबे के साथ पूरे बुन्देलखण्ड में कजलियां का त्यौहार विजयोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा है। कजलियों (भुजलिया) पर गाजे-बाजे और पारंपरिक गीत गाते हुए महिलाएं नर्मदा तट या सरोवरों में कॉलयां खोंटने के लिए जाती हैं। हरियाली की खुशियां मनाने के साथ लोग एक दूसरे से मिलेंगे और बड़े बुजुर्ग कजलियां देकर धन धान्य से पूरित क हने का आशीर्वाद देगे।

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